15 दिन, जिन्होंने जीवन को नई दृष्टि दी
01.08.2026
राष्ट्र सेविका समिति वर्ग प्रवेश 2026 जामडोली : एक सेविका के रूप में डॉ. सौम्या गुर्जर की अनुभूति
“तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित,चाहता हूँ मातृभूमि तुझको अभी कुछ और भी दूँ।”
“राष्ट्र कोई भूमि का टुकड़ा नहीं होता, राष्ट्र एक जीवंत चेतना है; और उस चेतना की सबसे बड़ी शक्ति उसका संगठित समाज होता है।”
परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का यह विचार कि “व्यक्ति निर्माण ही राष्ट्र निर्माण का आधार है” और परम पूजनीय श्री गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर का यह संदेश कि “राष्ट्रभक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि जीवन का व्यवहार बननी चाहिए” मेरे मन में सदैव प्रेरणा का स्रोत रहे हैं। राष्ट्र सेविका समिति के कार्यकर्ता विकास वर्ग में बिताए गए पंद्रह दिनों ने इन विचारों को केवल समझने का नहीं, बल्कि उन्हें जीने का अवसर प्रदान किया।
जीवन में कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जो केवल स्मृतियों का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि व्यक्ति के विचार, दृष्टिकोण और संकल्प को नई दिशा देते हैं। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहते हुए मुझे अनेक मंचों पर कार्य करने, विभिन्न वर्गों के लोगों से मिलने और समाज की विविध चुनौतियों को निकट से समझने का अवसर मिला है। लेकिन राष्ट्र सेविका समिति के कार्यकर्ता विकास वर्ग में बिताए गए पंद्रह दिनों ने मेरे मन और विचारों पर जो प्रभाव छोड़ा, वह मेरे जीवन के सबसे प्रेरणादायक अनुभवों में से एक है।
एक महिला जनप्रतिनिधि के रूप में मेरा सदैव यह विश्वास रहा है कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक निर्णयों या प्रशासनिक व्यवस्थाओं से नहीं होता। राष्ट्र का वास्तविक निर्माण समाज की चेतना, संस्कारों, संगठन शक्ति और नागरिकों के चरित्र से होता है।
संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय श्री गुरुजी का एक विचार है—
“हमारा कार्य किसी के विरोध का नहीं, बल्कि समाज को संगठित करने का है।”
कार्यकर्ता विकास वर्ग में रहते हुए मुझे इस विचार की वास्तविक अनुभूति हुई। यहां हर गतिविधि, हर संवाद और हर प्रशिक्षण समाज को जोड़ने, जागृत करने और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने की दिशा में केंद्रित था।
जब मैं शिविर परिसर में पहुंची, तब मन में उत्सुकता थी कि आने वाले दिन कैसे होंगे। लेकिन कुछ ही समय में यह स्पष्ट हो गया कि यह केवल प्रशिक्षण का कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति समर्पित महिलाओं का एक जीवंत परिवार है, जहां प्रत्येक गतिविधि के केंद्र में राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति उत्तरदायित्व की भावना है।
इस वर्ग में राजस्थान के विभिन्न जिलों से आई हुई सेविकाएं सहभागी थीं। जयपुर के अलावा दौसा, सवाई माधोपुर,धौलपुर, करौली, चूरू,झुंझुनूं, भरतपुर—लगभग पूरे राजस्थान का प्रतिनिधित्व वहां दिखाई देता था।
कोई छात्रा थी, कोई शिक्षिका, कोई चिकित्सक, कोई अधिवक्ता, कोई गृहिणी, कोई सामाजिक कार्यकर्ता और कोई सार्वजनिक जीवन में सक्रिय महिला नेतृत्वकर्ता। हम सभी की परिस्थितियां भिन्न थीं, लेकिन हमारा उद्देश्य एक था—राष्ट्र और समाज के लिए स्वयं को अधिक सक्षम, अधिक जागरूक और अधिक समर्पित बनाना।
इन पंद्रह दिनों के दौरान मुझे सबसे अधिक प्रेरणा वहां उपस्थित युवा सेविकाओं से मिली। आज की युवा पीढ़ी को लेकर अनेक प्रकार की धारणाएं बनाई जाती हैं, लेकिन इन युवा बेटियों के भीतर मैंने राष्ट्र के प्रति अद्भुत समर्पण देखा।
उनकी आंखों में भारत के उज्ज्वल भविष्य का स्वप्न था। उनके मन में समाज के लिए कुछ करने की बेचैनी थी। उनकी वाणी में आत्मविश्वास था और उनके व्यवहार में अनुशासन।
उन्हें देखकर मुझे स्वामी विवेकानंद के शब्द याद आते थे—
“मुझे सौ ऊर्जावान और चरित्रवान युवक-युवतियां दे दो, मैं भारत का स्वरूप बदल दूंगा।”
वर्ग की दिनचर्या प्रातः ब्रह्ममुहूर्त से प्रारंभ होती थी। जब अधिकांश लोग दिन की शुरुआत भी नहीं करते, तब पूरा परिसर प्रार्थना, अनुशासन और सकारात्मक ऊर्जा से जाग उठता था।
योग, व्यायाम, शारीरिक प्रशिक्षण, यष्टि अभ्यास, समूह गतिविधियां और विभिन्न अभ्यास केवल शारीरिक दक्षता बढ़ाने के लिए नहीं थे, बल्कि आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, आत्मानुशासन और मानसिक दृढ़ता के विकास का माध्यम थे।
यहां मुझे बार-बार यह अनुभव हुआ कि भारतीय नारी को केवल संवेदनशीलता का प्रतीक मानना उसकी क्षमता को सीमित करना है। भारतीय नारी करुणा और शक्ति दोनों का अद्भुत संगम है।
मौसीजी लक्ष्मीबाई केलकर कहा करती थीं—
“राष्ट्र के उत्थान का स्वप्न तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक नारी शक्ति जागृत और संगठित न हो।”
कार्यकर्ता विकास वर्ग में यह विचार प्रत्येक गतिविधि में जीवंत दिखाई देता था।
